كفى كذب وافتراء على الزعيم جنبلاط
2011-12-16 23:30:19

د . سلمان  خير 
كل  من  يعمل  قد  يخطئ  أو قد  لا  يفي  بالمطلوب  أو  بذلك  الهدف  الذي  صبا  إليه  ,  وهذا  بديهي  جدا  مع  أي  منا  فكم  بالحري إذا  كان  ذلك  الذي  يعمل  قائدا  وزعيما  أو  حتى  مفكرا  كوليد  جنبلاط . 
إن  جنبلاط  ككل  قائد  قد  تحلو  لنا  تصرفاته  أو  لا  نتفق  معها  أو  مع  بعضها  ولكن  بين  هذا  وذاك  وبين  أن  نتطاول  أو  نفتري  عليه  من  منطلق  عقائدي  أحيانا   من  أجل  موقف  مغاير  لتصريح  فردي  أو  جماعي  تبقى  المسافة  بعيدة  بينهما , وهذا  ما  لا  أقبله  ورأيت  لزاما  علي  أن  اكتب  هذه  الكلمات  وان  كانت  قد   لا  تنعم  لبعض  القراء  الكرام . 
من  خلال  مواصلتي   مع  بعض  الجاليات  المعرفية  في  سقاع   العالم أرسل  إلي  خبر  في  بداية  عام  2007  (  أي  منذ  ما  يقارب  5  سنوات )  مفاده  أن  وليد  جنبلاط  عرض  على  الإيرانيين  إعلان تشيعه ومعه كل دروز لبنان مقابل ملياري دولار       وذلك  على  حد  ادعاء  موقع  " المنبر "  الالكتروني   الصادر  من  سوريا  والمقرب  على  ما  يبدو  من  القيادة  فيها  أن  لم  يكن  صادرا  عن  القيادة  نفسها  .  فذعرت  من  هول  الخبر  الشئيم   سيما  وان  في  الوقت  نفسه  بدأت  استلم  من  جهات  مجهولة  الهوية  أخبار  عديدة  تمس  في  مشاعر  المعروفيين  وتنصب  عديدها  في  الخانة  المذهبية  والطعن  فيها  والى  ما عدا  ذلك  من  أعمال  لا  يجوز  وصفها  بأقل  من  قذرة  تقف  وراءها  أياد   خفية  ضالة  هدفها  تزوير  الحقيقة  وإيذاء  سمعة  الدروز  ربما  لغاية  في  نفس  يعقوب . 


بعد  التحري  السريع  من  بعض  الأصدقاء  الغيورين  في  تلك  الجاليات  واتصالهم  مع  الوطن  الأم  وعلى  حد  قول  احدهم  اتصاله  مع  وليد  جنبلاط  نفسه  ومع  بعض  القيادات  البارزة  في  حزب  التقدمي  الاشتراكي  تبين  ان  هذا  الخبر  هراء  في  هراء  وعار  تماما  عن  الصحة  وكان  الهدف  منه  على  ما  يبدو  إيذاء  وليد  جنبلاط  وإبعاد  الهيئة  الدينية  عنه  ومن  ثم  عزله  عن  محيطه  وذلك  لما  أبداه  من  مواقف  صلبة  ومعادية  للنظام  السوري  بعيد  استشهاد  حليفه  السياسي  وصديقه  الحميم  رفيق  الحريري ,  والكل  منا  يتذكر  تلك  الحقبة  من  الزمن  ولا  داعي  للخوض  فيها  إنما  التفكير  بردة  الفعل  لمثل  تلك  المواقف  اعلاه وكان  وليد  جنبلاط  يبيع  ويشتري  في  كرامة  الطائفة  وهو  بذلك  مثال  سيء  ( فاعملوا  مثله  يا  ضعفاء  النفوس  )  والتذكير  أن  قياداتنا  وان  زلت  أقدامها  أو  لا  نتفق  معها  حول  قضايا  وطروحات  عدة  ولو  في  بعضها  جوهرية  هم  أناس  محترمون ومقدرون  ولا  يجوز  القول  غير  ذلك  لأنهم  بالفعل  كذلك .      
على  ما  يبدو  فان  تلك  الأعمال  الشائبة  والمرتدة  على  أصحابها  أضحت  أحيانا  نصيب  قياداتنا  في  ضالة  ممن  يطلقها  ان  قوتنا  هشة  وان  عددنا  قليل  وغفا  عنه أن الكرام  قليل ,  والله  من  وراء  القصد .  


ملاحظة  :  في  الآونة  الأخيرة  نشرت  بعض  المواقع  الالكترونية  الخبر  أعلاه  على  أنه  حديث  مما  استوجب  الرد  الآن  .   

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